कोई ध्यान नही दे रहा है ,इस तथ्य पर.सबने एक हि रट लगा रखी है .क्या चोरी या किसी गुनाह के खिलाप केवल कडे कानून बनाने से वह गुनाह खात्म हुवा है .जी नही. क्यो कि गुनहगार हमेशा सोचता है कि मै इस तरह'' करुंगा'' की पकडा ही ना जावू .
तो बेहेतर यह है कि ऐसी प्रवृत्ती बढने का कारण ढुंडे और उसे जड से निकाल दे .
१)फिल्मे और TV इसका मुख्य कारण है.
''ऐसी'' फिल्मे नही बनेगी तो लोग उनके अभाव मे फटाफट मरणे वाले नही है .क्यो कि फिल्म तो जीवन आवश्यक वस्तू जैसे रोटी ,कपडा या मकान नही है ,या फिर फिल्म कोई जीव रक्षक दवा जैसे के antibiotics नही है के जिसके ना मिलणे पर मनुष्य के प्राण पखेरु उड जाये.
फर्ज करो आप ८ साल के है tv पर बार बार दिखाये जाणे वाले फिल्मो के कामुक और हिंसक प्रोमो आप के मस्तिष्क के नाजूक चेता कोशिकावो मे ''वो '' व्हायरस घुसा रही है, तो शुरू शुरू मे आपको लगता है,वो ,एक दुसरे को पकडणे वाले लडके लडकीया कुछ खेल ,खेल रहे है.जैसे के गुदगुदी करना ,आप खिल खिलाकर हसते है ,खुद भी ,गाणे और नाचणे लगते है .''आधुनिकता'' के तरफ आपका ऐसा लगाव देखकर आम भारतीय माबाप कि तरह आपके वाले भी धन्य धन्य यांनी कि गर्व महसूस करते है .फिर आप बडे हो जाते है तो समझते है -- अरें नही ...वो सिर्फ नाच नही रहे है बल्के एक दुसरे के कुछ अंगो को समस्तर पर ला रहे है.वो कुछ इशारा कर रहे .बस इसके बाद आपको ज्यादा समझाना नही पडता ,आपके शरीर मे जो टेस्टेस्टिरोन नामका हार्मोन पैदा होता है वो समझाता भी है और कुछ (साहस) करणे के लिये उर्जा और प्रेरणा देता है .अमरीकी बुद्धिवादी बर्ट्रंड रसेल ने कहा है कि हर सृजनात्मक कार्य के पीछे काम प्रेरणा होती है ..यह सच है मगर यह तभी हो सकता है जब काम उर्जा को अच्छे मार्ग के तरफ मोड दिया जाता है यांनी आज कि भाषा मे इस उर्जा को विकास कि दिशा मे चानलाइज करना चाहिये ,लेकिन फिल्म और व्यापारी जगत इसका इस्तेमाल पैसा कमाने के लिये कर रहे है .नतीजा, समाज मे हिंसा और अत्याचार बढ रहे है
दुनिया कि हर संस्कृती इस काम उर्जा(energy ) को समाज और व्यक्ती के विकास के तरफ मोड देणे के लिये ,कुछ नियम बनाकर हि विकसित हुई है .ऐसे नियमो को धर्म कहते है और उनके पालन के तरीके या शैली जो कि भौगोलिक परिस्तिथी के अनुरूप बनती है उसे ''संस्कृती '' कहते है .
जब धर्म और संस्कृती क्षीण बन जाती है तब समाज मे पशुता बढ जाती है ..फिल्म और TV यही काम कर रहे है .इस के और भी कारण है मसलन ,व्हलेंटाइन डे ,फ़्रेंड्शिप डे ,इत्यादी .
राखी ,और भाई दूज जैसे त्योहारोन्को कॉनव्हेंट स्कुलो मे दकियानुसि समज कर उनपर मजाक किया जाता है .न्यु इयर पार्टी तथा व्हलेंटाइन और फ़्रेंड्शिप डे को बढावा दे कर जीवन केवल शारीरिक सुख और वो भी बिना किसी सामाजिक नियंत्रण या उतरदायीत्व के मिलना चाहिये ऐसी मानसिकता
बनाई जा रही है ''बढते हुवे बलात्कार इसी मानसिकता का परिणाम है शारीरिक सुख चाहिये लेकिन उसे पाने के लिये ना तो सुसंस्कृत प्रयास चाहिये ना ही उसके पश्चात आणे वाली जीमेवारी चाहिये.इसी कारण बहोत से लोग इस '' IT'S MY LIFE'' तथा ''MY BODY MY RIGHT'' वाली पश्चिमी मान्यता को आधुनिकता मानते है ,लेकीन यह आधुनिकता तो FREE SEX के तरफ जा रही है जो कि बहुत ही ''पुरानी बात है
इसी तर्क से देखा जाये तो आदिमानव को ज्यादा आधुनिक समजना पडेगा क्यों कि ना तो वो शादी करता था ना ही कपडे पहनता था ,जब मूड आया किसी को भी उठवो और शुरू करो देह रंजन लेकीन इससे तो लढाई ,झगडे ,हिंसा का दौर चला होगा तब कही जाकर उसने इसे नियंत्रित करणे के लिये'' विवाह संस्था का अविष्कार किया इस तऱ्ह के समाजशास्त्रीय अविष्कारों के अलिखीत पुस्तक का नाम होता है ''संस्कृती'' .भारतीय संस्कृती कि किताब दुनिया मे सबसे बडी है बेशक इसमे कुछ दोष हो सकते है लेकिन मानवता के लिये यह कारगर सिद्ध हुई है. यांनी हमारी संस्कृती पश्चिमी यो से जादा आधुनिक यांनी के करीब पांच हजार साल आगे है ,अरे भाई ,वो तो अभी अभी 'आदिमानव के हथकंडे TRYकर रहे है.सारांश ,धर्म और संस्कृती कमजोर होणे के कारण पशुता बढ रही है ..फिल्म और tv वाले अभी आसू बहा रहे है लेकिन इस पाप मे उनका बहोत बडा योगदान हैइसलिये बहनो और भाई यो ...अपना गुस्सा इंन पर भी उतारिये,सेन्सर बोर्ड को निंद से जगाइये..ये लोग कहते है फिल्म मे sex और violence कहाणी के लिये आवश्यक है लेकिन क्या ऐसी कहानी समाज के लिये जीवनावश्यक है या नही यह कौन देखेगा ?